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Sunday, 25 December 2011

kabhi kuch aisa bhi ho

कभी कुछ ऐसा भी हो..
ना उदासी के बादल हो.
ना गम की बारिशे हो
ना  आँसू की नमी हो
ना गीली सी हँसी हो
कभी कुछ ऐसा भी हो...
तेरी बेरूख़ी की धूप न हो
मेरी चाहतो के साए न हो
ख्वाबो मे भी मैं ही हूँ
 और ख़्वाहिश मे  भी मैं ही हू
कभी कुछ ऐसा भी हो....
ना कोई कसक हो
ना कोई अहम हो
ना कोई जीत हो
ना कोई हार हो
सिर्फ़ एक खामोशी हो....
कभी कुछ ऐसा भी होकुछ....
 मौसम की रूमानी हो
कुछ मेरी मनमानी हो
कुछ पल हो चाहत के
कुछ पल हो राहत के
कुछ खोई सी, कुछ सोई सी
मैं और बस मैं ही  हूँ....

Sunday, 4 September 2011

sanjh


मैं सांझ के गीत गाती रही,
और सुबह दूर से मुस्कुराती रही
 मैं कण-कण उजाले के समेटती रही,
  और रोशनी दूर से टिमटिमाती रही.....
सुबह की लाली से उठा के कुछ अक्षर,
मैं रात के पन्नों पर गीत लिखती रही
झूठ और स्वार्थ की इस दुनिया में,
 सच्चाई मेरी बेमोल बिकती रही...
क्यू भूल गये हो मैं वही घनेरा वृक्ष हूँ,
रोशनी के लिए, जिसकी हर बार शाख जलती रही

Wednesday, 24 August 2011

jindagi


By Nidhi Sahu · about a minute ago
यूँ ही घूमते हुए
 लंबे, घने दरख्तो के दरमियाँ....
सफेद चम्पयी फूलों से रिस-रिस कर
बहती हे शीतलता......
एक पल को भटक जाती हे व्यथा...
तन्हाई जीती हुई मैं...
मुस्कुरा देता हे सुर्ख लाल गुलमोहर..
सिमट जाती हे निगाहें मेरी
चटकतीकलियों पर....
ज़िंदगी कुछ पलों मे सिमट आती है
कहता हे रजनीगंधा लहराकर........

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jiye he


By Nidhi Sahu · 7 minutes ago
जीए हे किंचित मैने वे पल,
प्रतिक्षण अंधकार से जूझते हुए
अपने अन्दर छुपी  सारी ,
आकाँक्षाओ व आशंकाओ के
विश्लेषण के बाद........
जिए हे मैने वे पल भी
समय से कही ज़्यादा तीव्र
अस्वाभाविक, असामयिक वेदना के,
डूबी और बही हूं वक़्त की लहरों के साथ
तब जाकर पाया हे मैने बूँद- बूँद विश्वास का योगदान
किया हे अनुभव व्यथा और आस्था का
जीवन मे
पाए हे मैने कथित वे पल

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Saturday, 23 July 2011

अनकहा....

सुनो.... क्यों  परेशानहो..?
तुम मुझसे नहीं अपनेआप से लड़ रहे हो.
सोचो....तुम मुझसे क्या  वापस लोगे...?
जो मेरे पास हे वो तो हमेशा से तुम्हारा ही था?
और तुमने.... मुझे कुछ दिया ही कहाँ..? हे ना.......
मानो........ तुम..
मैं  कभी जीतना नही चाहती..क्यों..?
इस हार में मैने  खुद को पाया है
तुम मत रूको, मत झुको...
चलते रहो की हम कभी मिले ही नही थे
बहते रहो........
मत कुछ कहो..
मुझे सब पता हे..
मिलते हे कही दूर हम
क्षितिज के उस पार.....
खो जाते हे मैं और तुम
एक दूसरे में
इसलिए  कह रही हूँ...समझती हूँ...
नहीं बुला पाओगे मुझे.....
मत कुछ कहो...
 मैं सुन रही हूँ..
अनकहा.... तुम तो थे मुझमें.....
हमेशा से ही.....
कभी रुकना दो चार पल..
और सुन लेना मेरी धड़कन...

Tuesday, 5 July 2011

pyaas


By Nidhi Sahu· Tuesday, April 5, 2011
mere hotho ko chua kar tune pyala jo chin liya
jindagi ek pyaas ban jayegi, socha na tha.
thartharate band hothon se har pal pukara he tujhe
har saans ek nai aas ban jayegi, socha na tha.
aaye the tum jindagi me sirf katl karne meri rooh,
teri salamati hi meri ardaas ban jayegi socha na tha.
loot chuke ho tum meri har khushi, har hansi,
dhadkane bhi udaas...rah jayegi,socha na tha.
meri bechargi ko kyai samajh paaoge kabhi tum,
chahat meri ek vanvas ban jayegi , socha na tha

By Nidhi Sahu· Thursday, April 7, 2011
teri yaadon ko  kisi kone me giraya tha,
wo panne hawa me na jaane kahan bikhar gaye.
aaj bhi  simat jaati hu us kone ki nigaaho se
 aaj bhi bikhar jaati  hu  uski mahak se'
 chaan leti he mere man ko,
  aaj bhi  uski aankhe
aaj bhi guljaar he tu, meri kasmasahat se....

ehsas


By Nidhi Sahu· Sunday, April 10, 2011

parchai


By Nidhi Sahu· Sunday, April 10, 2011

तू मेरे दिल में अहसास है समंदर सा,
मैं एक बरसाती नदी सी , मचल कर उतर गयी.
तू दूर बहुत, विस्तृत क्षितिज सा,
में एक छिटकी किरण सी, ज़मीं पर बिखर गयी.
तू ठहरा हे दिल की दहलीज़ पर तूफ़ान सा,
मैं एक बदली बिन बरसे ही बह गयी.
तू धूप का एक टुकड़ा लगे क्यूँ छाँव सा,
मैं खुद से टूटी  हुई, तुझ में सिमट गयी.

khamoshi


By Nidhi Sahu· Tuesday, April 12, 2011
कोई दिन बुलाने से नहीं आता
कोई रात चाहने से नहीं जाती.
कुछ रिश्ते चाह कर भी ,नहीं बन पाते,
कोई डोर तोड़ देने से नहीं टूटती.
कई ख्वाब हक़ीक़त  में बदल जाते हे
 कोई हक़ीक़त ख़्वाब नहीं बन पाती.
कई बाते धीरे धीरे ख़ामोश हो जाती हे.
कोई ख़ामोशी कभी बात नहीं बन पाती

dhadkan


By Nidhi Sahu· Tuesday, April 12, 2011
तुम्हारी प्यार भारी आँखों में देखा हे,
अपने दिल को धड़कते हुए
पीले अमलतास के झरते फूलों से
  बसंती हुआ मेरा मन,
छूना चाहता हे चुपके से,
तुम्हारे दिल को
,घुलना चाहता हे
 तुम्हारी धड़कनो में
स्वयं को समेट कर
सौंप दिया हे तुम्हें,
सुन रहीं हूँ खामोशी के,
इस मधुर गीत को,
महसूस करती हूँ ,
अपने अंदर से आती हुई,
तुम्हारी भीनीसी खुशबू को
सहेज लिया हे तुम्हें,
अपनी पलकों पे ,अधरों पे,

हथेलियों पे,
 क्योंकि तुम मेरी जिंदगी का,
 एक खूबसूरत पल .....