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Sunday, 4 September 2011

sanjh


मैं सांझ के गीत गाती रही,
और सुबह दूर से मुस्कुराती रही
 मैं कण-कण उजाले के समेटती रही,
  और रोशनी दूर से टिमटिमाती रही.....
सुबह की लाली से उठा के कुछ अक्षर,
मैं रात के पन्नों पर गीत लिखती रही
झूठ और स्वार्थ की इस दुनिया में,
 सच्चाई मेरी बेमोल बिकती रही...
क्यू भूल गये हो मैं वही घनेरा वृक्ष हूँ,
रोशनी के लिए, जिसकी हर बार शाख जलती रही